केवल शोध् एवं अनुसंधन हेतु
इस पाठ्यक्रम में प्रबु( विद्यार्थियों को उनकी इच्छानुसार शोध् विषय उनके प्राचार्य द्वारा बता दिया जाएगा। इस विषय पर कक्षा में चर्चा की जायेगी एवं सभी विद्यार्थी इसमें भाग लेंगे जिससे वे एक दूसरे के कार्य का लाभ प्राप्त कर सकें।
अनुसंधसन निम्नलिखित चरणों में किया जाएगा:
1. गोचन पफल, दशापफल, महादशापफल, समस्त मुहुर्त ज्ञान।
2. शोध् विषय का चुनाव ‘विद्वानों के पैनल’ द्वारा स्वीकृत होगा।
3. विद्यार्थी शोध् विषय की ठपइसपवहतंचील चार प्रतियां पेश करेगा, विषय के साथ ैलदवचेपे पेश करेगा।
4. शोध् विषय पर विद्यार्थी ‘शपथ-पत्रा’ द्वारा प्रमाणित करेगा कि इस विषय पर भारत में कहीं भी शोध् कार्य नहीं हुआ है। वह किसी की नकल नहीं कर रहा है।
5. विषय संबंधित आंकड़े सामग्री एकत्रित करना ;100 से 1000 तक अनूभूत सिंत बनानाद्ध
6. शास्त्रों से प्राप्त नियमों का व्यवहारिक प्रयोग।
7. नियम एवं पफल का संबंध् प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करना।
8. नए नियम एवं सूत्रा प्रस्तावित कर अंकित करना।
9. शोध् कार्य के पत्रिकाओं में छपवाना एवं म्गचमतज द्वारा जंचवाना।
10. शोध् प्रबन्ध् पूरा होने पर, आचार्य द्वारा ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ सही होने पर केन्द्र द्वारा मौखिक परीक्षा होगी।
11. विश्व के विभिन्न विद्वानों के जन्म कुंडलियों पर शोध् अनुसधन ।
योग्यता: ज्योतिष-अलंकार या उसके बराबर कोई पाठ्यक्रम अथवा 5 वर्ष का ज्योतिष का अनुभव। 500 अंक लेखर कार्य, 500 अंक मौखिक परीक्षा द्वारा।
